Plate Tectonic Theory in Hindi | प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत
पृथ्वी की सतह स्थिर नहीं है, बल्कि यह निरंतर परिवर्तनशील है। भूकंप, ज्वालामुखी, पर्वतों का निर्माण और महाद्वीपों का खिसकना—ये सभी घटनाएँ प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत से सीधे जुड़ी हुई हैं।
भूगोल (Geography) की प्रतियोगी परीक्षाओं जैसे UPSC, SSC, रेलवे, TET, CTET और State PCS में Plate Tectonic Theory in Hindi से जुड़े प्रश्न अक्सर पूछे जाते हैं।
इस लेख में हम विस्तार से जानेंगे कि प्लेट किसे कहते हैं, प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत क्या है, प्लेटों के प्रकार व सीमाएँ कौन-कौन सी हैं, तथा प्लेट टेक्टोनिक्स से पर्वत, भूकंप और ज्वालामुखी कैसे बनते हैं।
यदि आप भूगोल को सरल भाषा में, उदाहरणों और परीक्षा उपयोगी तथ्यों के साथ समझना चाहते हैं, तो यह लेख आपके लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है—अतः इसे अंत तक अवश्य पढ़ें।
प्लेट किसे कहते हैं?
पृथ्वी का बाह्य भाग (crust) दृढ़ भूखंड का बना हैं जिसमें क्रस्ट से लेकर मेंटल की ऊपरी परत (100-150 किलोमीटर) तक का कुछ हिस्सा शामिल हैं। पृथ्वी के इस सम्पूर्ण हिस्से को कई हिस्सों में बाँटा गया हैं जिसे प्लेट (Plate) कहा गया हैं। इन प्लेटों को मुख्यतया महाद्वीपीय और महासागरीय प्लेटों में विभाजित किया गया हैं।

प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत क्या हैं?
वर्ष 1955 में सर्वप्रथम कनाडा के भू-वैज्ञानिक जे. टूजो विल्सन (J-Tuzo Wilson) ने ‘प्लेट’ शब्द का प्रयोग किया था। प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत का प्रतिपादन सर्वप्रथम 1967 मैकेंजी, मॉर्गन व पारकर पूर्व के उपलब्ध विचारों को समन्वित कर ‘प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत’ का प्रतिपादन किया गया था। यह भूखंडिय गतिशीलता का सिद्धांत है। इससे पहले अल्फ्रेड वेगनर महोदय द्वारा महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत का प्रतिपादन किया गया था। यह उसी सिद्धांत का विस्तृत और वैज्ञानिक रूप हैं।
इस सिद्धांत के अनुसार समस्त पृथ्वी 7 विभिन्न प्लेटों में बँटी हुई हैं जो संवहन धाराओं के प्रभाव से भूगर्भ के दुर्बलता मंडल पर स्वतंत्र रूप से तैर रही हैं जो समय समय पर स्थानांतरित होती रहती हैं। अर्थात इनमें लगातार गति होती रहती हैं।
प्लेटों की इस गति के कारण, प्लेटों के सीमांत क्षेत्र में भूकंप, ज्वालामुखी, पर्वत निर्माण जैसी विवर्तनिकी क्रियाएं होती हैं।
विवर्तनिकी शब्द से तात्पर्य पृथ्वी की आंतरिक शक्तियों द्वारा भूपृष्ठ पर होने वाले परिवर्तन से हैं जिसके कारण स्थलाकृतियों का निर्माण संभव होता हैं।
इस सिद्धांत की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान हेरी-हेस (Harry Hess) द्वारा किया गया। बाद में विल्सन, मॉर्गन, मेकेंजी (Mackenzie), पार्कर (Parker) आदि विद्वानों ने भी इस सिद्धांत के विकास में योगदान दिया। हेरी हेस ने समुद्र तल-प्रसार की परिकल्पना के आधार पर इस सिद्धांत का प्रतिपादन किया।
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प्लेट विवर्तनिकी संकल्पना के अंतर्गत पृथ्वी के भू-पटल को सात बड़ी एवं छह प्लेटों में विभाजित किया गया हैं। ये हैं;
- भारतीय- ऑस्ट्रेलियाई प्लेट
- अफ्रीकन प्लेट
- उत्तरी अमेरिकन प्लेट
- दक्षिण अमेरिकन प्लेट
- अंटार्कटिका प्लेट
- यूरेशियन प्लेट
- प्रशांत प्लेट
प्लेटों में गति क्यों होती हैं?
- कम घनत्व के चट्टानों से निर्मित होने के कारण प्लेट नीचे स्थित मेंटल के प्लास्टिक सतह पर तैर रहे हैं।
- कुछ विद्वानों के अनुसार प्लेट कटकों एवं ट्रेंचों के बीच गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव से खिसकते हैं।
- एक अन्य मान्यता यह हैं कि कटकों पर मैग्मा के निरंतर प्रवाह के कारण, प्लेटों में खिसकाव होता है।
- होम्स के संवहन तरंग सिद्धांत के आधार पर भी प्लेटों की गति की व्याख्या होती हैं। भू-गर्भ में दबाव एवं रेडियो एक्टिविटी के कारण काफी अधिक ताप उत्पन्न होता हैं, जिसके फलस्वरूप संवहन तरंगो की उत्पत्ति होती है।
प्लेटों के विभिन्न सीमान्त वर्ग:
1. रचनात्मक या अपसारी प्लेट (Divergent: extensional):
जब दो प्लेट्स विपरीत दिशा में गति करते हुए एक दूसरे से दूर जाती हैं तो इस क्रिया में भूगर्भ का लावा ऊपर उठकर नए द्वीपों या प्लेट का निर्माण करता हैं। अपसारी प्लेट का सबसे बड़ा उदाहरण अटलांटिक महासागरीय कटक हैं।
2. विनाशात्मक या अभिसारी प्लेट (Convergent compressional):
जब दो अलग अलग घनत्व वाली प्लेटें गति करती हुई एक दूसरे के की तरफ बढ़ती हैं तो उनमें टकराव होता हैं एवं ज्यादा घनत्व वाली प्लेट कम घनत्व वाली प्लेट के नीचे धंसने लगती हैं। इससे दोनों प्लेटों के किनारों पर विनाशकारी प्रभाव देखने को मिलता हैं। मोड़दार पर्वतों का निर्माण भी इसी क्रिया के द्वारा होता हैं। जैसे- हिमालय , रॉकी-एंडिज
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3. संरक्षी या निष्क्रिय प्लेट (Transform: shearing):
जब दो Plates गतिशील अवस्था में एक दूसरे से रगड़कती हुई विपरीत दिशा में आगे बढ़ जाती हैं तो इसमें न तो प्लेट का निर्माण होता हैं और न ही विनाश होता हैं। इस क्रिया में ट्रांसफॉर्म भ्रंश का निर्माण होता हैं।
प्लेट टेक्टोनिक्स एवं पर्वत निर्माण:
अधिक घनत्व वाली प्लेट के नीचे धंसने से वहां गहरी खाई का निर्माण होता हैं, जिसे समुद्री गर्त कहा जाता हैं। पुनः महासागरीय प्लेट अधिक गहराई में बेनी-ऑफ क्षेत्र (Beni-of-Zone) में जाकर पिघल जाता हैं।
ये पिघली हुई चट्टानें मैग्मा के रूप में धरातल पर उद्गारित होती हैं। रॉकी एवं एण्डीज पर्वतीय क्षेत्र में यह स्थिति देखने को मिलती हैं, जहां प्रशांत महासागरिय प्लेट एवं अमेरिकी प्लेट के बीच टकराव की क्रिया हो रही हैं।
इस प्रकार यह सिद्धांत न केवल रॉकी एवं एण्डीज की उत्पत्ति की व्याख्या करता हैं, बल्कि एण्डीज पर ज्वालामुखी चट्टानों की बहुलता एवं पेरू ट्रेंच की भी व्याख्या करता हैं। यहाँ प्रशांत महासागरीय प्लेट का प्रत्यावर्तन अमेरिकी प्लेट के नीचे हो रहा हैं।
महाद्वीप अभिसरण से उत्पन्न पर्वतमालाओं के उदाहरण अल्पाइन हिमालय पर्वतीय क्षेत्र में देखने को मिलता है। यहां भारतीय प्लेट एवं यूरेशियाई प्लेट के बीच होने वाली टक्कर के फलस्वरूप टेथिस सागर के मलबों एवं भू-पटल में मोड़ पड़ने के फलस्वरूप हिमालय पर्वतमाला का निर्माण हुआ।
इसी प्रकार अफ़्रीकी एवं यूरेशियाई प्लेट के टकराव के फलस्वरूप आल्प्स एवं एटलस पर्वत-मालाओं का निर्माण हुआ।
हिमालय क्षेत्र में ज्वालामुखी के प्रमाण नहीं मिलते हैं। इसके दो कारण हैं- पहला कारण यह हैं कि यहाँ भारतीय प्लेट का प्रत्यावर्तन काफी कम गहराई तक हुआ हैं तथा दूसरा कारण यह है कि इस पर्वतीय क्षेत्र की ऊंचाई काफी अधिक है।
तीसरी स्थिति में स्थिति में, जब दोनों ही प्लेट महासागरीय होते हैं, तो टकराव के फलस्वरूप एक प्लेट का अग्र भाग दूसरे प्लेट के नीचे प्रत्यावर्तित हो जाता है एवं इससे उत्पन्न संपीड़न द्वारा द्वीप तोरण एवं द्वीप चाप (Island Festoons and Island Arcs) के पर्वतों का निर्माण होता हैं।
इस प्रकार की स्थिति का उदाहरण जापान द्वीप चाप के रूप में देखने को मिलता हैं। महाद्वीपों एवं इन चपाकार द्वीप समूहों के बीच छिछले सागर मिलते है, जिन्हें पृष्ठ चाप बेसिन (Back Arc Basin) कहा जाता है। जापान सागर पृष्ठ चाप बेसिन का उदाहरण हैं।
प्रत्येक चाप के महासागरीय किनारे की तरफ गहरे ट्रेंच पाये जाते हैं। साथ ही, प्रत्यावर्तित प्लेट के अधिक गहराई में जाकर पिघलने के कारण ज्वालामुखी क्रिया होती हैं एवं ज्वालामुखी पर्वतों का निर्माण होता हैं।
FAQs (Frequently Asked Questions):
प्रश्न – प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत क्या है समझाइए?
उत्तर : इस सिद्धांत के अनुसार समस्त पृथ्वी 7 विभिन्न प्लेटों में बँटी हुई हैं जो संवहन धाराओं के प्रभाव से भूगर्भ के दुर्बलता मंडल पर स्वतंत्र रूप से तैर रही हैं जो समय समय पर स्थानांतरित होती रहती हैं। अर्थात इनमें लगातार गति होती रहती हैं। प्लेटों की इस गति के कारण, प्लेटों के सीमांत क्षेत्र में भूकंप, ज्वालामुखी, पर्वत निर्माण जैसी विवर्तनिकी क्रियाएं होती हैं।
प्रश्न – प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत के जनक कौन है?
उत्तर : कनाडा के भू-वैज्ञानिक जे. टूजो विल्सन (J-Tuzo Wilson)
प्रश्न – प्लेट किनारे कितने प्रकार के होते हैं?
उत्तर : 1. रचनात्मक या अपसारी प्लेट (Divergent: extensional)
2. विनाशात्मक या अभिसारी प्लेट (Convergent compressional):
3. संरक्षी या निष्क्रिय प्लेट (Transform: shearing):
प्रश्न – सबसे छोटी प्लेट कौन सी है?
उत्तर :सबसे छोटी प्लेट कैरिबियन प्लेट मानी जाती है।
प्रश्न – सबसे बड़ी प्लेट कौन सी है?
उत्तर : प्रशांत महासागरीय प्लेट
प्रश्न – महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत किसने और कब दिया?
उत्तर : जर्मन मौसमविद अल्फ्रेड वेगनर ( Alfred Wegener ) ने “ महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत” सन् 1912 में प्रस्तावित किया।
प्रश्न – पृथ्वी में कितने प्लेट हैं?
उत्तर : भूपटल पर सात बड़ी व चौदह छोटी प्लेटें हैं
प्रश्न – प्लेट की सीमाएं कितनी होती हैं?
उत्तर : प्लेट की तीन सीमाएं होती हैं – अपसारी, अभिसारी एवं अपसरण।
प्रश्न – भारतीय प्लेट का क्या नाम है?
उत्तर : इंडो-आस्ट्रेलियन प्लेट
पर्श – प्रशांत प्लेट कहाँ स्थित है?
उत्तर : यह प्लेट उत्तरी अमेरिका के पश्चिमी तट के साथ-साथ अलास्का तक फैली हुई है।
प्रहण – महाद्वीप सिद्धांत किसने पेश किया?
उत्तर : अल्फ्रेड वेगनर
निष्कर्ष:
प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत (Plate Tectonic Theory in Hindi) पृथ्वी की आंतरिक गतिशीलता को समझने का सबसे वैज्ञानिक और मान्य सिद्धांत है। इसी सिद्धांत के माध्यम से हम यह स्पष्ट रूप से समझ पाते हैं कि भूकंप क्यों आते हैं, ज्वालामुखी कैसे बनते हैं और हिमालय, एंडीज जैसे पर्वतों का निर्माण कैसे हुआ।
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