ज़ोया के अरमान हिंदी कहानी | सामाजिक सरोकार पर आधारित एक कहानी

'ज़ोया के अरमान' सामाजिक और पारिवारिक दोष पर आधारित एक ऐसी कहानी है जो आज के इस कठोर समाज में पली बड़ी एक शिक्षित लड़की के संघर्ष की दास्तां बयां करती है। 

ज़ोया के अरमान


हमारी कहानी का मुख्य किरदार है ज़ोया। ज़ोया मतलब "ज़िन्दगी". ज़ोया नागपुर के एक छोटे से गांव में रहती थी। उसके पिताजी एक छोटी सी दूकान चलाते थे। ज़ोया का छोटा भाई था जिसका नाम था अमन। नाम से अमन था लेकिन बड़ा शैतान था।


माँ दिन-भर घर का काम करती थी। ज़ोया को आठवीं के बाद पढ़ने का मौका नहीं मिला। उसकी पिताजी की सोच थी की लडकियां ज़्यादा पढ़ -लिखकर क्या करेगी। जो की एक नकारात्मक सोच और समाज की एक नकारत्मक और पिछड़ी हुई सोच की ओर इशारा करता है।


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अमन छटवी में पढता था। उसे पढ़ने का ज़्यादा शौक न था। उसका ज़्यादातर होमवर्क ज़ोया कर देती थी। ज़ोया एक गुणवान और मेधावी लड़की थी। वह अपनी कक्षा में अव्वल आती थी। उसे नृत्य करने का बड़ा शौक था।

वह रोज शाम को चुपके से एक नृत्य सिखाने वाले सेंटर में नृत्य  सीखती थी। हर तरीके का नृत्य करना वह अपनी 14 साल की उम्र में सीख गयी थी।


उसे डर था कहीं उसके पिताजी को यह बात पता न चल जाए वरना आफत आ जाएगी। ज़ोया अपने पिताजी के दूकान पर बैठती थी और दूकान भी संभाल लेती थी। ज़ोया एक खुश मिजाज लड़की थी। उसने कभी भी अपने पिताजी के उसूलु के खिलाफ शिकायत नहीं की थी।

वह अपने भाई, माँ और पिताजी की हर काम में सहायता करती थी। एक दिन पिताजी को यह बात पता चल गयी कि ज़ोया नृत्य अभ्यास करती है। पिताजी को यह बात रास नहीं आयी और उन्होंने ज़ोया का निकाह तय कर दिया।

ज़ोया के अरमानो को पूर्ण विराम डालने के लिए वह तत्पर हो गए। ज़ोया की माँ ने ज़ोया का पक्ष लिया।
ज़ोया के पिताजी अपनी जिद्द पर आ गए। उन्हें ज़ोया के सपनो की और उसकी इच्छाओं की कोई कदर न थी। ज़ोया 16 साल की थी।

हमारे देश में नाबालिग लड़की की शादी करवाना कानून जुर्म है लेकिन अपने दकियानूसी सोच के आगे उसके पिताजी को कुछ नज़र नहीं आ रहा था। ज़ोया ने फैसला कर लिया था। उसके सहन करने की आदत ने तो जैसे जवाब दे दिया था। निकाह के पहले वाले दिन ज़ोया ने खाना नहीं खाया था।

अगला कदम उसके लिए महत्वपूर्ण था। उसने नृत्य संस्थान से छात्रवृत्ति प्राप्त की थी लेकिन उसका ज़िक्र उसने कही नहीं किया। उसने अपना घर बेमन से छोड़ने का फैसला किया। अपने अरमानो को पंख देना चाहती थी। उसकी माँ ने दिल पर पत्थर रखकर अपनी बेटी को घर से विदा किया।

वह दिल्ली चली गयी। पिताजी ने हमेशा के लिए दिल के दरवाज़े ज़ोया के लिए बंद कर दिए। ज़ोया ने अपने कोशिशों और मेहनत नृत्य में महारत हासिल की। वह अपने इंस्टिट्यूट में डांस टीचर बनी और भारत की सांस्कृतिक नृत्य को आगे बढ़ाने के लिए जी तोड़ मेहनत की।


उसने भारत के नेशनल डांस कम्पटीशन में द्वितीय पुरस्कार जीतकर अपने परिवार का नाम रोशन किया। 2 साल की कड़ी मेहनत के बाद उसने अपने अरमानो को पंख दिए लेकिन अब ज़ोया ने पढ़ने के लिए कॉरेस्पोंडेंस का कोर्स ज्वाइन कर लिया था।

वह अपने घर वापस जाना चाहती थी मगर हिचकिचा रही थी। उसे पता चला उसके पिताजी की तबीयत ठीक नहीं है। ज़ोया अपने गांव गयी। माँ उसे देखकर बेहद खुश हुयी लेकिन अमन ने मुँह फेर लिया। उसे ज़ोया की इतनी कामयाबी बर्दास्त नहीं हुयी।

अमन की अध्ययन में कोई ख़ास रूचि न होने के कारण उसने स्कूल जाना बंद कर दिया और पिताजी की दूकान सँभालने लगा। ज़ोया अपने पिताजी के पास गयी उसने रो कर और हाथ जोड़कर माफ़ी मांगी। उसे लगा उसे पिताजी कभी स्वीकार नहीं करेंगे लेकिन यह गलत था।

उसके पिताजी ने उसे अपने पास बुलाकर कहा-" ज़ोया हमे माफ़ कर पाओगी"

ज़ोया ने कहा-" पिताजी ऐसा मत कहिये ! माफ़ी तो मुझे मांगनी चाहिए."

पिताजी ने कहा -" मैंने कभी तुम्हे या तुम्हारी क़ाबलियत को समझने की कोशिश नहीं की"

ज़ोया ने तुंरत कहा " अभी आप आराम कीजिये और सब मुझ पर छोड़ दीजिये"

ज़ोया ने अपने पिताजी का इलाज अस्पताल में करवाया। ज़ोया को नौकरी से जितने पैसे मिलते वह अपने घर भेज देती। पिताजी को अपनी गलती का एहसास हो गया था।

ज़ोया के पिताजी ने उसे अपने चाहतों और सपनो को जीने के लिए ज़ोया को आज़ाद किया। माँ- बाप को अपने बच्चो को समझना चाहिए, लड़के-लड़की में भेदभाव करना यह एक सामाजिक और पारिवारिक दोष है। माँ- बाप बच्चों के शिक्षक होते है।


अभिभावकों की यह ज़िमेदारी बनती है की वह अपने बच्चो की क़ाबलियत को समझकर उसे अपने मार्ग में प्रोत्साहित करे। बच्चो पर किसी प्रकार का दबाव उसके जीवन के लिए हानिकारक साबित हो सकता है। बच्चो के सपनो को उड़ान देने की कोशिश करना माता- पिता का फ़र्ज़ होता है।

ज़ोया जैसी कई कर्तव्यपरायण लडकियां है जो अपने परिवार के विरुद्ध अपने सपनो को पूरा करने की कोशिश तक नहीं कर पाती। इस सोच में पड़ जाती है की लोग क्या कहेंगे या समाज की प्रतिक्रियाएं क्या होगी? ज़िन्दगी जीने का मौक़ा एक भी बार मिलता है।

अगर कोई निश्चित रूप से निडर होकर सपनो को पूरा करने की कोशिश करेगा तो अवश्य किसी दिन सफलता और संतुस्टी उसे मिल जाएगी।

ज़ोया अपने परिवार को जोड़कर रखना चाहती थी और वही उसने अंत में किया। उसने अपनी परिवार की ज़िमेदारी उठायी। यह एक कठोर समाज की शिक्षित लड़की की एक छोटी सी कहानी है।


लड़कियों को पढ़ने का उतना ही मौका मिलना चाहिए जितना की लड़को को, तभी देश साक्षरता के मार्ग पर खरा उतरेगा।

लेखक के बारे में,

मैं रीमा बोस, एक Msc B .Ed शिक्षिका रह चुकी हूँ। मुझे बचपन से ही हिंदी लेख में रूचि रही है। मेरी यही कोशिश है की लोग मेरे लेखों को पढ़े, पसंद करे और उनसे प्रेरित हो 

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धन्यवाद। 

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